गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस को दुनिया का एक पवित्र ग्रन्थ माना जाता है। इस ग्रन्थ में प्रातः स्मरणीय भगवान श्री राम की महिमा का ऐसा वर्णन आता है जो कहीं और हमें सुलभ नहीं हो पाता है । इसी पवित्र ग्रन्थ रामचरित मानस में एक दोहा आता है, इस दोहे में बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी हमें लिखकर बताते हैं ....
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| राम भक्त हनुमान जी पर कृपा बरसाते हुए भगवान श्री राम |
कलयुग केवल नाम अधारा
सुमिर सुमिर नर उतरा ही पारा !
गोस्वामी तुलसीदास जी के श्रीमुख
से निकले इस दोहे का अर्थ यह है कि कलयुग में केवल श्रीराम के नाम से ही मोक्ष की
प्राप्ति हो जाती है।
कलयुग में मात्र राम नाम की
महिमा को जपने से ही अपने जीवन के उद्देश्य को हम साकार कर सकते हैं । जो सच्चे मन
से प्रभु राम का नाम जप लेता है उसके जीवन की नैय्या हर मझधार से निकलते हुए
शांतिपूर्वक आगे बढ़ने लगती है। बाबा तुलसी ने इस दोहे के बहाने यह बताने का
प्रयास किया है कि राम नाम की महिमा हर युग में मोक्ष प्रदान करने वाली रही है,
चाहे राम नाम का सहारा भक्त प्रहलाद ने लिया हो, चाहे माता शबरी ने लिया हो, चाहे
द्रोपदी ने लिया हो, चाहे सुदामा ने लिया हो । गोस्वामी तुलसीदास जैसे कितने ही भक्तों ने नाम का सहारा
लेकर अपनी नैया को पार लगाया है।
बाबा तुलसी अपने स्वयं के जीवन
प्रसंगों के अनुभवों के आधार पर जब कहते हैं कि कलयुग में श्री राम नाम की महिमा
अपार है तो इसे एक प्रामाणिकता भी मिल जाती है । राम नाम के जाप मात्र से ही
मनुष्य अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
हम और आप जैसे तमाम दुनियादार
लोगों के जीवन से राम बहुत दूर चले गए हैं , इसलिए हमारे जीवन में दुःख और अशांति
का स्थान बढ़ गया है । भौतिक सुख सुविधाओं की अधिक से अधिक प्राप्ति को ही हमने
जीवन का उद्देश्य बना लिया है । जीवन में सारी गड़बड़ियां यहीं से आरम्भ हुई हैं । भौतिक सुख सुविधाओं को जुटाने के लिए ही आज दुनिया में दुराचार और भ्रष्टाचार की
अधिकता है । ज्यादा से ज्यादा धन जुटाने के लिए लोग विचलन की राह पर चल पड़े हैं । मनुष्य भौतिक सुख सुविधाओं में लीन होकर ईश्वर को भूल गया है। जो ईश्वर को भूल जाए
उसके जीवन में सुख शांति कहाँ से आएगी । उसके जीवन में तो कलह और क्लेश के लिए ही
जगह बचती है । जहाँ राम नाम नहीं है , जहाँ केवल कलह और क्लेश है, वहां मुक्ति की
संभावना बन ही नहीं सकती । मुक्ति के लिए जीवन में शांति चाहिए, आनंद चाहिए,
परमानंद ! परमानन्द तो केवल राम नाम में ही है !
जो इस परमानन्द से दूर होता है उसे अंत में पछताना पड़ता है। भगवान श्री राम के जीवन पर ही अगर हम नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि श्रीराम प्रातः उठकर अपने माता-पिता व गुरुओं के चरण स्पर्श करते थे। पिता राजा दशरथ के आदेश का पालन करते हुए ही श्री राम ने राजपाट का त्याग कर ऋषि मुनियों के सानिध्य में वनवास को चुना । उन्होंने अपने जीवन में मर्यादा का जिस तरह पालन किया वह एक अतुलनीय उदहारण है । मर्यादा पालन के कारण ही वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी कहलाये। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का नाम लेना आज के बिषम समय में आत्मा के लिए शक्ति पुंज की तरह है जहाँ से परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है । राम नाम ही मुक्ति का एक मात्र रास्ता है । हम सब कलियुग में राम का नाम लेंगे तो हमारे जीवन में सुख शांति अवश्य आएगी । जय सिया राम ।
-प्रतिमा शर्मा
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